बुध कुँवार १२ , १२ आश्विन २०७९, बुधबार| थारु संम्बत:२६४५

लर्कापर्कनके टिहुवार ‘गुरही’

लर्कापर्कनके टिहुवार ‘गुरही’

भूमिका
संस्कृति हरेक समुडायके आपन मौलिक पहिचान हो । पहिचान, कौनो फेन जाटके आपन कला, संस्कृटि ओ भासासे जोरल रहठ् । थारू समुडायमे फेन अस्टे ढेर संस्कृटि रहल बा । जौन अब्बे ढेउरहस् लोप हुइना अवस्थामे बा । बँचल कुछ संस्कृटि बाह्य संस्कृटिके प्रभावमे बा । अब्बे उ संस्कृटिक मौलिकटा उपर फेन प्रस्न उठ्टि आइल बा । यिहेओरसे थारू समुडायके द्विविढामे रहटि आइल बा । ओ, आ अपने मेरके टर्क विटर्कसे समाज भिट्रे अन्यौलके स्ठिटि सिर्जना हुइल यठार्ठ फेन हमार ठन बा । ओम्हेंसे थारू समुडायके एक महट्वपूर्न टिउहार ‘गुरहि’ फेन हो ।

का हो गुरहि ?
‘गुरहि’ थारू समुडायके एक बाल टिहुवार हो ओ यिहिहे ढेउरजाने खाँज–खुज्लि फेंक्ना टिहुवारके रुपमे फेन लेठाँ । यि टिहुवार सावन महिनाके ओजरिया (शुक्ल पक्ष) के पञ्चमीके डिन परठ् । यिहे डिन हिन्दूनके नामपञ्चमी फेन परठ् ओ अवधी समुडायके गुडिया पर्व फेन परठ् । उहे कारनसे ‘गुरहि’ ओ नागपञ्चमि अक्के हो कना ढेउर मनैनके बुझाइ रहल बा । मने यि संयोग किल हो वास्टविकटा नै हो । थारू समुडायके ‘गुरहि’ टिहुवारके अपने सामाजिक मुल्य ओ मान्यटा बा कलेसे नागपञ्चमिके अपन बा । नागपञ्चमीमे साँप ओ बिख्खार किरनके पूजा कैजाइठ् मने गुरहिमे ना साँपनके पुजा हुइठ् ना टे कौनो बिख्खार बिच्छि, गोजरके । यि डुनु टिहुवारके मुल्य मान्यटा ओ लोक बुझाइ फेन अलग अलग रहल ओरसे यि अलगअलग टिहुवार हो कना बात बुझ्ना जरुरि बा ।

थारू समुडाय प्रकृटि पुजक् अठवा प्राकृट ढरम समूह भिट्टरके एक जाट हो । प्रकृटि प्रटिविश्वास कैना समुडाय रहल ओरसे प्राकृट ढरम हि थारू जाटिनके पुरान ढरम हो कना बात ढेर इटिहासकार उल्लेख कैले बटाँ । मने पाछेक समयमे हिन्दू ढरमके प्रभावसे आपनहे हिन्दू रहल डाबि करुइयनके संख्या फेन बा । उहे कारनसे कुछ हिन्दू ढरमके पौरानिक मान्यटा फेन थारू समुडायमे अनुसरन हुइटि आइल बा । यि स्वभाविक प्रकृया फेन हो । खस्मोर्वा बैठाइ फेन कारन हो । उहेसे एक औरेक ढरम, आस्ठा ओ संस्कृटिप्रटि सड्भाव ओ समान व्यवहारके कारन अन्य समुडायके सांस्कृटिक प्रभावसे कुछ संस्कृटि थारू समुडायके लाग आपने मौलिक होसेकल बा ।

‘गुरहि टिहुवार एक गुरहि (नेपाली भासामे गाइने किरा) से जोरल बा । गुरहि एक उरना किरा हुइँट् । यि मच्छर, भुस्का लगायट छोटछोट किराहे खैठाँ । यइनके संरच्छनसे मच्छर (लामखुट्टे) ओ भुस्का लगायट किरनमे कमि हुइना रोगबिरोग कम लग्ना बैज्ञानिक ढारना बा ओ यिहे किरनके पुजासे टमान मेकरे रोगबिरोग कम हुइना जनविश्वास थारू समुडायमे बा ।

लोक–मान्यटा
गुरहि टिहुवारसे सम्बन्ढि एक लोक बट्कुहि बा । टबक् जवानामे नरकमे मेरमेरिक किरनके संख्या बर्हल ओ रोग फेन फैलल् । रोगके कारन मनैनके अकालमे मौट हुइ लागल । मनैं मुँवट डेख्के स्वर्गलोकके डेंउटा फेन अचम्म पर गैलाँ ओ यि बात बुझक् लाग एक लवन्डिहे नरकलोक (पिर्ठमी) मे पठैलाँ । ओ, उ लवँरिया एक साढारन परिवार जलम लेहल् । ओकर बाल्यकाल बहुट सुखसे बिटल । परियारमे सक्कु जाने मजा मानिट । मने, ओकर भौजि कब्बो निक नैमन्ना उहेहे डेखके सहे नैसेक्ना, बहुट डुःख डिस् । विचारि उ सहके बैठे ।

उ छोटछोट लर्कन संगे खोब खेल्ना मन पराए ओ खेले । उहिहे लर्का फेन बहुट निक मानिंट । लर्कनसंगे उ चिर्कुट्टि चिर्कुट्टा लुग्रक गुरहि खोब मन पराए । मने, ओकर गुरहि डेखके ओकर भौजि सहे नैसेक्ना ओ गुरहि कबु नुका डेना टे कबु फेंका डेना करिस् । अइसिक करेबर उ बहुट डुःख माने । मुले उ कुछ कहे नैसेके । उ भौजिक डरसे कबु डेहरिक गोराटिर नुकाए, कबु घरक कोनुवाँमे । अइसिक नुकैलेसे फेन भौजी फेंकाडिस् । एक डिन अपन खेलौना गुरहिहस् किरनके उट्पट्टि कराइल् । जब गुरहि हावामे उरे लग्लाँ टब उ ओट्रा सुग्घुर सुग्घुर डेख्के बहुट फोंहाइल् । ओकर बाल सखि सहेलिन फेन कुडुक कुडुक खेले लग्लाँ । उहे गुरहि मच्छर, भुस्का लगायट छोटछोट किरनहे खाइ ओ मारे लग्लाँ । जिहिसे मच्छर, भुस्काके प्रकोप फेन कम हुइल हो ओ रोग बिरोग फेन कम हुइल ।

यहोर मनैनके फेन अकालमे मौट नैहुइलग्लिन । यहोंर जब मनैं चयनसे खाइ, पिए, सुटे लग्लाँ । आब उ लवन्डिहे फेनसे स्वर्गलोक जाइ पर्ना हुइलिस् । संगे उठ बैठसे ओकर बालसखी लोग उहिसे मोहिट होसेकल रहिँट । उहेसे उहिहे कौनो हालटमे नैजाइडेब कैह्के रोके छेंके लग्लाँ । लकिन केक्रो कुछ नैलागल् । उहिहे जैहि पर्ना हुइल ओरसे कोइ फेन रोके नैसेकल् ।

टब यहोंर ओकर सखिया गोहियन मेरमेरिक गुरहि ओ डगरामे भुख लग्लेसे खाइक लाग चना लगायटके खैना चिज डेके बाजा सहिट बिडाइ करे जैठाँ । यहोंर ओकर भौजि अपन छावइहे ओकर गुरहि अँछोरके बगाइ कैह्के सिखाके पठैले रठिस् । सक्कु सखिन लावा लावा झुलवा घालके चानकु कोंहरिक पहुरा लेके गाउँक् सिवानासम पठाइ जैठाँ । जब कोंहरि ओ चिर्कुटिक् गुरहि गुरहा डेके बिडाइ करे लग्ठाँ टब्बहें भौजिक् छावन अँछोरके बगैना ओ सोंटाले पिटे लागल टे उहे कोंहरि डेके पठैला ओ गुरहिहे गाउँसे बिडा कैलाँ ।

घर छोरके जाइबेर उ अपन घरक् डेहरिक गोराटिर ढैल गुरहि सम्झल । टब डाइहे डेहरि टिर ढइल् गुरहि मजासे ढैडेहो, मजासे सहेर डेहो कैह्के गिट गइटि असिक कहठ्,

दाङ बोले टिम्कि, महडेवा बोले ढोल
डेहरिक गोरटिर ढइल बा मोर गुरहि ।

ओत्र किल नैहो, स्वर्गलोक जाइबेर उ ढेर ठाउँ बिसैटि जाइठ् । अमली, असना, गुलरिक रुखुवा टिर बैठ्के अपन विरह असिक कहट्,

दाङ बोले टिम्कि, महडेवा बोले ढोल
अमलिक रुखवाटिर बैठहिं मोर गुरहि ।
दाङ बोले टिम्कि, महदेवा बोले ढोल
असनक् रुखवाटिर बैठहिं मोर गुरहि ।
दाङ बोले टिम्कि, महदेवा बोले ढोल
गुलरिक् रुखवाटिर बैठहिं मोर गुरहि ।

अइसिक भूख, प्यास, डुःख कस्ट झेल्टि उ स्वर्गलोकमे हाजिर हुइल् । यहोंर उहे लवन्डि गुरहिक् सम्झनामे यि गुरहि मनैना चलन चलल् हो ।

सामाढामा
गुरहिमे अपन चेलिबेटि नाटनट्कुरनहे नेंउट जाइठ् । नाटपाँट अइलेसे थारू घरेक् खानपिनके सामाढामा कैना पुरान चलन हो । बिहन्नि सुवर मर्ना लगायत काम आउर आउर टिउहारके नन्हे गुरहिमे फेन सामाढामा हुइल रहठ् । पहिलक् जबानामे लुगरा फाटा कम रहे उहेसे मुस्किलसे एक जोर जरावर मिले । घरक् सक्हुनके लग नैपुगाइ सेक्लेसे फेन लर्कन लग भर सिवइहि पर्ना रहे । गुरहि अस्राइ जाइबेर लावा लावा लुगरा घालके जैना हुइलक ओरसे लर्कनके फेन लावा जरावरके अस्रा रहिन् ओ घरक् गरढुरियक् बाढ्यटा फेन रहे । ओस्टक लर्कन लुग्रा सिलक उबेनु चिर्कुटिक गुरहि–गुरहा बनैना, लवन्डन लग रारा खरह्के सोंटा । सोंटा बनाइक लग लाल–काइल रंग ओ मूँज अठवा पूँज । चानक घुघरि (कोंहरि) चाना नै रहले डलहन बालि बर्का केराउ, भट्ठर निढ्ना, भुज्ना । पछिल्का समयमे भूजा फेन बिकल्पके रुपमा डेखा परल् बा । उहेसे भुजा भुज्ना । ओस्टके गुरहि उठैना नुइयाँ, सुपलि टठिया फेन चाहठ् ।

कैसिक मनाजाइठ् गुरहि ?
ओजरिया रातके चौठा डिन चौकिडरवा गाउँमे हाँक पारठ । ‘घुघरि भिजाउ रेउ ! घुघरि भिजाउ’ । गाउँक सक्कु जाने सन्झा चानक् घुघरि (कोंहरि, चानक एक विशेष प्रकारके परिकार) भिजैठाँ । डोसर डिन पञ्चमीक रोज सन्झा चाना निंढ्ठाँ ओ गाउँक् सक्कु घरके छोटछोट लर्का बिसेस लवन्डिन चिर्कुटिक टुक्रक् गुरहि, चानक घुघरि चाना नैरलेसे केराउ अठवा डलहन बालिके कोंहरी (घुघरि) ओ लवन्डन भर सोँटा (कोंर्रा) लेके टयार हुइठाँ । सोँटा रारा (काँस) के एक फुलरा अठवा डुइ फुलरा वाला रहठ् । यहोंर गाउँभरिक सक्कु लर्कनहे खोब जोग्निहस् सँपरैठाँ ।

साँझके गाउँके चौकिडरवा हाँक पारठ । ‘अरे ! गुरहि अस्राइ चलो रेउ, गुरहि अस्राइ टब गाउँक् लर्कनहे लेले लर्कनके डाइ, डाइ नैअइलेसे डिडि, फुइनके संगे लेके निकर्ठां । सक्कु जाने घरघरसे नुइयाँ, टठियामे गुरहि ओ घुघरि बहुट मजासे सेंरह मेंरहके निक्रठाँ । जब यहोंर गुरहि अस्राइ निक्रठाँ टब गाउँक् सक्कु घरक मल्किनियन, गरढुरिनियन या भन्सरिनियन टठिया ओ सुप्पा ठटैटि ‘खाँज खुजलि सक्कु लैजा, रोग बिरोग सक्कु लैजा कहटि घरक् भिट्टरसे निक्रठाँ ओ डगरसम गुरहिसंगे रोगबिरोग पठाइ अइठाँ । ओ पिर्ठमि लोक (पृथ्वी) छोरके स्वर्गलोक जाइबेर उ गुरहिसे सुनाइल विरहके भाव फेन गइठाँ

दाङ बोले टिम्कि महडेवा बोले ढोल,
अमलिक् रुखवाटिर बैठहिं मोर गुरहि ।

जब गौर्हि (गाउँभरके गोरु जम्मा हुइना ठाउँ) मे गाउँ भरिक लवन्डा लवन्डिन अठवा कन्या लवन्डिन जम्मा हुइठाँ । टब गाउँके पन्हेरवा एकठो निसाना गारठ् । ओकर एक पाँजर सक्कु लवन्डन पट्निक् पहाँटके ठरयइठाँ । यहोर लवन्डिन नुइयाँ, टठियामे लानल् गुरहि ओट्ठँहे फेकैठाँ ओ लवन्डन उहे गुरहिहे सोंटासे ठठैटि ‘डे घुघरि, डे घुघरि’ कहठाँ । ओकर बाड घुघरि मागे लग्ठाँ । छोटछोट बाबुनके अपन डाइ, डिडिनके सहयोगमे सक्भर ढेरजनहनहे पुग्नामेरके घुघरि बँट्ठाँ ओ बँट्टी गाउँके मरुवा (भुइह्यारठान) मे जैठाँ । उहाँँ गाउँक् ग्राम डेंउटनहे प्रसाड चर्हाके मरुवक् छप्रक् उप्पर छिट्ठा, ओ घुघरिमे डुब्बा मिलैठाँ । असिके डब्बा मिलाइल घुघरि खैना योग्य जो हुइठ् ओ बँट्ना काम फेन ओराइठ् । ओ सक्कु जाने अपन अपन घर अइठाँ । घर आके फेन अपन घरक् उप्पर, अनाज ढैना ढनसार ओ बारिमे लगाइल टिनाटावनमे छिट्ठा । अइसिक करलेसे घरेम भूटप्रेट नैअइना, रोगबिरोग ओ खाँज खुजलि नैलग्ना, बख्खारिमे बरकट अइना, बारिके टिनाटावन फर्ना थारू समुडायमे जनविश्वास बा ।

ओस्टेके लवन्डनसे ठटाइ लैगइल सोंटा कोइ फेन नैडेख्ना मेरके नुकाके अठवा चोराके नान्जाइठ् । उ नानके टिनहाँ बारिमे बाँढजाइठ् । अइसिक करलेसे किरा फटिंगा नैलग्ना ओ फल फेन मजा लग्ना बात थारू समुडायमे सामाजिक ढारना रहल बा । ओस्टेके उहे सोंटाहे ढूप लगाके घोटके घाउ, खट्रामे लगैलेसे चोखैना, पेट बट्ठी ओ जुरि आइलेसे फेन यि बिरुवक् रुपमे काम लग्ना जानकारलोग बटैठाँ । अइसिक गुरहि टिहुवार विढिवट् ओराजाइठ् ।

यि खास कैके छोटछोट लर्कनके टिहुवार हो अठवा कन्या लवन्डि सहिटके टिहुवार हो । यि टिहुवारहे भातृत्व प्रेमके टिहुवार फेन मानजाइठ् । घुघरि बँट्ना जौन चलन बा । यि एक डोसरमे भावनात्मक सम्बन्ढ जोरठ ओ आत्मविस्वास पैडा करठ् । ओट्रे किल नै यि टिउहारमे अपन चेलिबेटि, नाटनट्कुर फेन नेउँट् जैना हुइलक ओरसे आत्मियता बर्हठ्, कलेसे खेटिमाटि कैलक जिउ, हिलाकिचाके कारन आँगेम् खाँज खुजलि ओ अपन अन्नबालि फेन सप्रना जौन सामाजिक ढारना बा यिहिसे फेन यकर महिमा बर्हके आइल् बा ।


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