अत्वार जेठ ०८ , ८ जेष्ठ २०७९, आईतवार| थारु संम्बत:२६४५

रुपन्देहीक् थारु लोकसाहित्यके अवस्था

रुपन्देहीक् थारु लोकसाहित्यके अवस्था

बमबहादुर थारु
परिचय
थारु लोकसाहित्य कलक् थारु जाति जुगजुगसे एक पुस्तासे डोसर पुस्तामे मौखिक रूपमे लोकगीत, लोकगाथा, लोककथा, लोककहकुट, लोकटुक्का, लोकबुझौलिया आदिक् माध्यमसे लोकव्यवहार हस्तान्तरण कर्टी आ रख्लक लौकिक् साहित्य वा परम्पराहे बुझाइठ् । पूरुब मेचीसे पच्छिउँ महाकालीसम् करिब २५ जिल्लम् थारु जातिक आवादी बा । मने थारुहुक्रनके भेष, भाषा, संस्कृति, रीति, परम्परा ओ रहनसहनम समेत एकरूपता नैपाजाइठ् । समग्रमे कलेसे सक्कु ओरिक थारु जातिक लोकसाहित्य समेट्ना बहुट कर्रा काम हुइ सेकी । उहमार यी लेखमे रुपन्देहीहे किल अध्ययनके थलो मानके थारु लोकसाहित्य प्रस्तुत कर्ना प्रयास कर्ले बटँु ।
१. लोकगीतके परिचय
अलिखित रूपमे कण्ठके आधारमे गैना गीतहे लोकगीत कठंै । यी भाव ओ संगीतके माधुर्यमे छलक्टी लोकमानसके हृदय गीतक मूल बनके प्रष्फुटित हुइठ् । लोकगीत मानव जीवनके उषाकालसे अभिनसम अनुभूतिजन्य कैय मानसिक इतिवृत्ति, हर्ष, विषाद, आनन्द, क्षोभ, स्तुति, निन्दा, रोमांन्स, हँस्ना, क्रोध, आकर्षण, विकर्षण आदि मानवजीवनके मेरमेरिक अभ्यन्तरिक भाव सहज, स्वाभाविक, गेय, धार्मिकतायुक्त अर्थात संगीतमय उद्गारके रूपमे जनगलासे निरन्तर रूपमे रसाइठ् । पन्त (२०२५ः १७) के परिभाषा अनुसार लोकगीत केउफे दबाव, धन–बक्सिस ओ लोभ समेतमे नैपर्के स्वयं दुखित, उत्पीडित, आक्रान्त, उद्विग्न, सम्भ्रान्त, त्रस्त, जाग्रत, प्रफुल्लित, हर्षित, संयुक्त ओ विमुक्त समेत ज्या कोइ जाति, व्यक्ति, लिड्ड, समाज, जिल्ला, गाउँ समेतके नर–नारी कौनो पुस्तक बन्धनम ना पर्क बनल् हुइठ् । उहेमारे एम्नेमे ना टे कौनो आडम्बर हुइठ् ना टे कौनो तडक–भडक ओ उच्छृङ्खलता, यी ऐनाहस् कञ्चन ओ पारदर्शी हुइठ् ।
स्वरूप
थारु लोकसाहित्यम निहित प्रवृत्ति एवं विशेषतक् आधारमे यहिहे ६ वर्गमे विभाजन कर सेक्जाइ । १. लोकगीत २. लोकगाथा ३. लोकनाच ४. लोककथा ५. लोकोक्ति ६. विविध लोकोक्तिमे फे निम्न विधा बा (क) लोक कहकुट (ख) लोक टुक्का (ग) लोक बुझौलिया ।
विधागत रूपमे उपरोक्त वर्गहे यी मेरसे वर्णन करे सेक्जाइ ः
वर्ष–दिन भिट्टर गैना आधारम लोकगीतके छुटी वर्ग–विभाजन
ओस्टे टे समग्र थरुहटमे प्रचलित लोकगीतहे वर्गीकरण कैना हो कलेसे उ अत्यन्त व्यापक हुइ सेक्ना डेर बा, काकरे कि थरुहटमे जन्मसे मृत्युपर्यन्त असंख्य लोकगीत उपलब्ध बा । अभिन थारु लोकगीतमे गीत, संगीत ओ नृत्यके त्रिधाभिव्यक्ति हुइलक ओरसे अनेक मनोभाव अभिव्यक्त हुइटी रहठ् । उहेओर्से यी गीतक अजश्र–भावधाराहे खण्डित कर्ना ना सम्भव बा ना टे समुचित फे । थारु जाति स्वाभावसे प्रकृतिपूजक हुइलक ओर्से लोकगीतके मूख्य आधार वा प्रेरणक स्रोत फेन प्रकृतिपरक अवयवहँ फे मूल रूपमे बा । मुले बुझ्ना ओ छुटी अर्थमे प्रस्तुत कैना सहजके लाग वर्ष–दिनहे अर्थात १२ महिनाहे मूख्य आधार बनाके वर्गीकरण कर सेक्जाइ ।
१. वैशाख— वियाह गीत, बिरहनी गीत, झमटा, तितला ।
२. जेठ— बिरहनी, खेलनी, झिझिया, झमटा, तितला ।
३. असार— बिरहनी, खेलनी, झिझिया, झमटा, बेठौनी, गोरु बेढाइ ।
४. सावन– खेतवाही, धर्तिक जलमौती, बिरहनी, खेलनी, बैठौनी, कजरी, बलहा गीत, गुडिया गीत, बरहमासा, रमझुमडी, खेतझुमडी, उदासी, किर्तन ।
५. भाडोँ— खेतवाही, धर्तिक जलमौती, कजरी, निरौनी, बलहा गीत, बरहमासा, भादा, झुमडा, पटेवा, रमायण, सोरठी, अष्टिमकी, पटिदारी, कंशलीला, जागरन ।
६. कुवाँर— झुमडा, बरहमासा, उदासी, पटेवा, रामलीला, कृष्णलीला, राधना, पचरा, सखिया झुमर, झिझिया, झमटा, महाभारत ।
७. कातिक— झुमडा, देबी गीत, महाभारत, रामलीला, बरहमासा, भोरहरी, बिहग्रा ।
८. अगहन— धनकटनी गीत, लवाँगी पूजा गीत, बनगितवा ।
९. पुस— पराती, फुलवार, गोबिना गीत ।
१०. माघ— मघौटा गीत, मैनागीत, लगनी, सोहर, बियाह गीत, झुमरा, बनगितवा, फाग, कबीर ।
११. फागुन— फगुवा, कबीर, बियाह गीत, झुमडा, बनगितवा ।
१२. चैत— चैती, चैता, चैतीकुसुम, तितला, निर्गुन आदि ।

प्रमुख लोकगीत ः
चाँचर, भाडा, उदासी, बिरहनी, भोरहरी, बारहमासा, बैठक्की, बियाह गीत, सोहर, बैठौनी गीत, पचरा, फुलवार, धर्तिक जलमौटी, सिटला पूmलमटी, खेतवाही, चैता, चैती, बनगितवा, खेतझुमरी, रमझुमरी, हिँडोलवा, भूmमर, खेलनी, रतौली, तितला, झिझिया, पटेवा, झुमरा, सोरठी, लहचारी, सुमरौटी, डोहा, मरसिया, झर्रा, झमटा, बिहग्रा, चौपाई, देशवन्ती, गारी, गुडिया, कजरी, असटिमकी, फगुवा, कबीर, उलारा, भजन, रौरा, खेम्टा, पुर्बी, दादरा, डोल, दोतल्ली, जति बैसवाडा आदि ।
घोडी बकुलनी, हिट्टुकुवँर, चारुयार, सत्तलसेन रजवा, सोरठी वृजाभार, रानीसारंगा सदावृक्ष, मामी बिसहेरिया, सतीबिहुला, धर्तिक जलमौटी, फुवार, आल्हा, सिँकाढोलन, लोरिकायन आदि ।
लोकगाथा ः कौनो फे कथाहे लोकगीतक माध्यमसे सुनैना फेन लोकगाथा हो । थारु समुदायम ऐसिन गाथक भन्डारे बा । साँझके बेरी खाइ अंगनक आँजरपाँजर बैस्के फुर्सतके ब्यालम चाहे समूहमे बैस–बैसके काम करबेर ऐसिन रोचक खिसा कहानी वा बट्कोही कना चलन रठा । जस्टे, घोडी बकुलनी, हिट्टुकुवँर, चारुयार, सत्तलसिंघ रजवा, सोरठी वृजाभार, रानी सरंगा छेडावृक्ष, मामी बिसहेरिया, सतीबिहुला, धर्तिक जलमौटी, फुलवार, आल्हा, सिँकाढोलन, लोरिकायन आदि ।
लोकनाच ः मनै आपन सुखान्त आवेगहे नाच–गान कैक प्रकट कर्ल । अनेक अवसरमे प्राप्त सुखान्त अनुभूतिसे आनन्दित हुइक लाग आपन आन्तरिक उत्साहहे लिरौसि ओ स्वाभाविक रूपमे प्रकट कर्ना गीत गैटी नाच लग्ल । पुरुषक सङ्हे जन्नीहुँक्र फे आपन सखीसहेलीहुक्रनसंग मनोरञ्जनात्मक किसिमसे आपन हार्दिक अनुभूतिहँ प्रदर्शन कर्ठ । इहि लोकनृत्य वा लोकनाच कठ । लोकनाचहे मुख्य कैक चार भागमे विभाजन कर सेक्जाइठ् ।
क. धार्मिक लोकनाचः— यम्नेम देवी–देवता, अवतारी पुरुषहुँक्र वा लोकनायकहुक्रन्क अराधना, स्तुति, अर्चना, अभ्यर्थना, चरित्रगान वा लीलाक नृत्यसे प्रदर्शन कर्ठै । जस्टे महाभारत
(बर्का नाच), रमझुमरी (रामायण), रामलीला, कंशलीला, रासधारी आदि ।
ख. सामाजिक लोकनाचः— यम्नेम सामान्यतया पारिवारिक सामाजिक वा यहलौकिक जीवनसे संबन्धित कथावस्तु रहठ् । जस्टे पटिडारी, दिलचस्की, झुमरा, टिरिया चरित्र, बिदेशिया, नागरसभा, राजा–रानी, जोगीरा, सागर सोहानी चंगेरा, चनवा उढार, चारुयार, सीतवसन्त, सफेडा आदि ।
ग.ऐतिहासिक लोकनाचः— दन्त्यकथम आधारिट नृत्य यम्नेम पर्ठा । जस्टे, राजा बिकरमा, राजा भरतहरि, सोरठी–वृजाभार, वाणसुर, पटेवा, सतीबिहुला, हरिश्चन्द्र आदि ।
घ.विविध लोकनाचः— यी अन्टर्गत ऋतु, मौसम वा कैयो अवसर अनुसार प्रदर्शित हुइना नृत्य फे पर्ठा । जस्टे झिझिया, झमटा, गोरु वेढाई, लाठीनाच, मजोर नाच, कालकलौती, झर्रा आदि ।
लोककथा
एहिहे थारु समुदायमे लोकखिसा वा बट्कुही कठैं । थरुहटमे याकर अक्षय भन्डार फे उपलब्ध बा । एम्नेमे जिज्ञासा ओ कौतुहलतक अद्भुत शक्ति सम्मिलित रहठ् । यम्नेम सहज मनोरञ्जनसे लेके दार्शनिक तत्व समेत समाहित हुइठ । थारुहुक्र मुख्यतः कृषि कार्यमे संलग्न रहठ । कृषि कार्य ओराके घरेओर आइबेर ठकाईसे जिउ सिहरल ब्यालम लोकखिसक श्रवण ओ वाचनसे आपन ठकाई कम कैना प्रयत्न कर्ठैं । लोकखिसक आलोकमे पुरा शारीरिक डुखाई भुलैटी मनोरञ्जन प्राप्त कर्ठ । लर्कापर्कनहे ओइनक बुबाबुडी वा बाबा डाइ लोकखिसा सुनाके सुटैठैं । लोकखिसम प्रयुक्त अडभिंङ पात्र ओ घटनाक्रम खिसाहे स्वाडिस्ट ओ अद्भुत बनाके श्रोतन आनन्दमे लीन करैठैं । थरुहटमे प्रायः खिसा रातमे सुन्ना प्रचलन बा । दिनके खिसा सुन्ना दोष लागठ् कना लोकविश्वास फे रहल बा । खिसा सुरु हुइलसे पहिले कथावाचक एकजन श्रोतासंहे हुँकारी भर्ना या हाँ मे हाँ मिलैना सर्तमे खिसा सुरु हुइठ् । लोकखिसाहे निम्न वर्गमे विभाजन करे सेक्जाइठ ः
क. प्रकृति सम्बन्धी लोकखिसाः— जस्टे रूखवा, पाटपटिंगर, नदी–नाला, जमुहानिक पोखरी, केदलिक बनुवा, हावा ओ सुरुज आदि ।
ख. पशुपक्षी सम्बन्धी लोकखिसाः— जस्टे टोटामैना, उँटवा सियरा, गोहवा बनरा, सियरा खरहा, खेचुहिया खरहा, सँपराजा, बुढिया बनरवे, फुरगुडिया भँटवा, नैनी मछरिया, टिपटिपवा, बघवा लोहखडिया, बकुलवा भगत, बनरा सियरा, सार्दुल चिरैयाँ, मेघियारानी, बेलउती रानी, बनरा बनरिनिया (सारंगा सदावृक्ष), सियरा मुर्गिया, जमुनी सियारिन ओ बडवा सियरा, पुँछउखार, मजोरवा धनरजवा, बघवा बिलरिया, गोङैरा मामा ओ चिङैरा भैने, मामी बिसहरिया, संखी पिलिनिया आदि ।
ग. धर्म ओ पौराणिक लोकखिसाः जस्टे महाभारत, रामायण, राजा हरिश्चन्द्र, भक्त प्रह्लाद, श्रवणकुमार, शिव पार्वती, वलि राजा, सती अनसुया, सती बिहुला, हित्तुकुवँर आदि ।
घ. ऐतिहासिक लोकखिसाः जस्टे जितगढी लडाई, सेमलारके पटुरिया पोखरी वो गोर्रहिया बगिया, मेजरहिया सडक, महटिनिया बान्ह, गोरावलके गोरा वीर आदि ।
ङ. सामाजिक लोकखिसाः जस्टे चारुयार, सीता वसन्त, सदिया बदिया, तोतामैना, तीसमार खाँ, रडपुटवा, हंसजवाहिर, रानी सारंगा आदि ।
च. नीति ओ उपदेशात्मक लोकखिसाः जस्टे अपने चलत राजा गँडिया कटैला, सीता ना मीता मोर पेटवेक चिन्ता, फुटहा डेङ लैके निकरो हो बुढवा, नेउरा मारके पछतो आदि ।
छ. प्रेम लोकखिसाः जस्टे सारंगा सदावृक्ष, हंसजवाहिर, लैला मजनु, गोपीकृष्ण, माधोनल आदि ।
ज. देवी देउटक लोकखिसाः जस्टे लुम्बिनीमाई—लुम्बिनी, शनिचरीमाई—देवदह, महेरवामाई—बिचौवापुर, मलमलचौरा—भडछा, कोल्हुवा जमकातर—कोल्हुवा, सतियामाई—सिलौटिया, मर्चवारीमाई—मर्चवार, कुमारवर्ती—, अहिरिनियामाई—डहरगाउँ, कोटियामाई—बकसड, पर्रोहापरमेश्वर—पर्रोहा आदि ।

झ. गुरवा झारफुँक लोकखिसा ः जस्टे सितला पूmलमती, कोढनी भवानी, अकाकाल गुरबाबा, रहसुगुरो, दलसिंह धामी, किचरी गुरिनिया, महादेव पार्वती, धरतिक जलमौती, सातो बहिनवार, सिहाभार, रमचेहरापुरके सम्मे आदि ।
ञ. पराक्रम ओ साहसके लोकखिसा ः जस्टे झाँसिक रानी, आल्हाऊदल, घोडी बकुलनी, हातिमताई, भिम्हवा, दैन्तरवा, डा.क्याइसिंह आदि ।
ट.चमत्कारिक लोकखिसाः जस्टे नरसिंह अवतार, इन्द्रासनके परी, रडपुतवा, चारपाला बाबा आदि ।
ठ. हास्यविनोड लोकखिसाः जस्टे शिव पार्वतिक बचनिया खट्ट, सदिया बदिया, शुकवा शनिचरा, भुडुकपदनी, अहिरदमाद, यिहीँ हमार हेरागैल, तीन त्रिलोक चौदह भुवन, मरिगैल टे मरिगैल चारदिनके पठादेव, भैल सम्धी भैल काने ओनेम ना बराइँ आदि ।
ड. विविध लोकखिसाः जस्टे भुटवा, बनपलिया, खटमुटना गुरौवा, घरैल–घरैल मसैल–मसैल बनैल–बनैल हडैल–हडैल आदि ।
५.लोकोक्तिः बाटचिटक डौरानम आपन कहाइहँ थप कलात्मक, सारगर्भित ओ विश्वस्नीय बनाइक लाग कुछ विशेष शब्दावलीक प्रयोग कर्जाइठ्, जिहिँका लोकोक्ति कहिजाइठ् । लोकोक्ति सहितक वाक्यम विचित्रक चमत्कारिकता, ओज ओ पुष्टी कर्ना प्रामाणिकता समेत हुइलक ओर्से श्रोतनक दिल ओ दिमागम यि लिरौसिसे प्रभाव जमाइठ् । उहमार लोकहँ रिझाई सेक्ना खुबिक कारण याकर नाउँ लोकोक्ति हुइलक हो । थारु समुदायम लोकोक्तिहँ मूख्य कैख डिहल बमोजिम तीन भागम वर्गीकरण कैगिल बाः
क. कहकुटः कहकुटहे पूरुवमे कहकुट, कहवी, केहवी, कहावट ओ पच्छिउओंर कहकुट कह जाइठ । नेपालीम कलेसे उखान ओ अंग्रेजीम प्रोभर्व कठ । कुछ उदाहरणः
कानी घोडी लंकक चढाइ ।
रोटी मोट निक, जनी छोट निक ।
पाव भरके देवी, नौ पावके पुवा ।
इच्की–बिच्की सबकेउ डेइ, एक बिट्टा लुगरी केनाइँ डेइ ।
भैल बियाह मोर करबे का ?
मरगैल टे मरगैल, चार दिनके पठादेव ।
ख. टुक्का ः लोकसाहित्यके लोकोक्तिक रूपम चलल श्रव्यविधा अन्टर्गतके एक विधा टुक्का हो । लोकोक्तिम कना उखान–टुक्का अक्केसंहे कहजैना बा टब फे कहकुट ओ टुक्कम ढ्यार अन्तर ड्याख मिलठ । जस्ट किः आँख फुटेक, गोल होएक, टाङी मारेक, तेल लगाएक, दाल गलेक, हगके पछताएक ।
ग. बुझौलिया ः लोकोक्तिमध्ये बुझौलियक बरा महत्व बा । वृहत् हिन्दीकोश अनसार कौनो फे बुद्धि वा ज्ञानहे परीक्षा लेना एक मेरिक प्रश्न, वाक्य वा वर्णन ज्याकर कौनो वस्तुहे भ्रामक वा टेँ¥हमे¥ह लक्षण डैके ओहीहे बुझ्ना वा अभिष्ट वस्तुक नाउँ बटाइक लाग श्रोतन कहजाइठ् । सही उत्तर डेहुइया स्वतः जिट्ना बाँकि सही उत्तर डेह नि सेकलम पुछुइयाहे माँगल गाउँ डेह पर्ना ओ पाछ फे श्रोतन सही उत्तर बटा डेना हुइलक ओरसे नेपालीम यहिह गाउँखाने कथा कहजाइठ् । थारु समुदायम पूरुवमे फोकडा, फकडा, बुझौवली, पिहानी ओ पच्चिउँओंर बुझौलिया खिसा कहजाइठ् । बुझौलिया बुझाइबेर स्याकट्सम् अरबर शब्ड नि होके सजिल, हाँस्यास्पद वा मनोरञ्जनात्मक वाक्यमे पुछ्जाइठ् जौनसे उत्तर डेहुइया मनै रिस ना मान्क लिरौसिसे भाग लै सेक्ठै । जस्ट किः
आन्ही आय पानी आय, बैठल घेघरी भेँभा बाय । (का हो ?) (मेघा) ।
उँपरे आगी तरे कुवाँ, गुडगुड बोले निकरे धुवाँ । (का हो ?) (हुँक्का) ।
डाइक कान बाबक कनवे नै । का हो ? (कराही बटुला) ।
सोना मिलल चानिम, गैल भैँस पानिम । का हो ? (पानेक बिरा) ।
कंचन–१ बकुलगाढ, रुपन्देही


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